Janmashtami Vrat Katha – श्री कृष्ण जन्म कथाः – पुराण कथा

Krishna janmashtami katha

Krishna katha किसे सुनना अच्छा नही लगता, हर कोई krishna bhagwan ki leela को देखकर अपने दुखों को भूल जाता है इस साल krishna janmashtami date है 11 august और 12 augustइस साल कृष्ण जन्माष्टमी दो दिन को देखने को मिल रही है। लेकिन कोरोनावायरस के चलते, इस साल हम सब को एक दूसरे का ध्यान रखते हुए अपने अपने घर में ही लड्डू गोपाल ( ladoo gopal ) का जन्मदिन मनाना है।

 

जब-जब इस धरती पर पाप बढ़ा है, तब-तब भगवान को किसी ना किसी रूप में धरती पर अवतार लेना पड़ा है। बहुत से लोगो के मन में यह विचार आता है, कि आखिर क्यों मनाई जाती है कृष्ण जन्माष्टमी?

 

आखिर क्यों मनाई जाती है कृष्ण जन्माष्टमी?

पौराणिक धर्म ग्रंथों के अनुसार जब धरती पर कंस के प्रकोप से लोगो में हाहाकार मचा था। तब लोगो की पुकार सुनकर भगवान विष्णु को अत्याचारी कंस का वध करने के लिए धरती पर अवतार लेना पड़ा था। संयोग की बात यह थी कि कंस का वध उसकी प्रिय बहन की संतान के हाथों से होना था।

जैसे की हम सब जानते है, कि जन्माष्टमी पर्व भगवान कृष्ण के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। कृष्ण जन्माष्टमी भारत में ही नही बल्कि विदेशों में भी धूमधाम से मनाई जाती है।

हर वर्ष भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmashtami 2020) मनाई जाती है। इस साल कृष्ण जन्माष्टमी 11 और 12 अगस्त 2020 को मनाई जाएगी।

अब हम जाने गए कि किसी तरह भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार लिया और किस तरह अत्याचारी कंस का वध हुआ।

 

कृष्ण जन्माष्टमी कथा —

 

भारत की सात प्राचीन और पवित्र नगरों में से एक है मथुरा ! मथुरा में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था।

द्वापर युग में मथुरा में उग्रसेन नाम के एक राजा हुआ करते थे। राजा उग्रसेन बहुत नर्म स्वभाव के राजा थे। राजा उग्रसेन की दो संताने थी एक पुत्र और एक पुत्री,राजा उग्रसेन के पुत्र का नाम कंस था। कंस बहुत ही चालक था उसने अपने पिता का राजपाठ शीनकर खुद राजा बनकर प्रजा पर अत्याचार करता था।

कंस की बहन का नाम देवकी था। कंस अपनी बहन से बहुत स्नेह करता था। देवकी का विवाह वसुदेव से तय हुआ देवकी और वसुदेव का विवाह संपन्‍न होने के बाद कंस स्‍वयं ही अपनी बहन को ससुराल छोड़ने के लिए रवाना हुआ।

 

जब कंस अपनी बहन को छोड़ने के लिए जा रहा था तभी एक आकाशवाणी हुई:-

“हे कंस! जिस बहन को तू बड़े प्रेम से विदा करने स्‍वयं ही जा रहा है,उसकी आठवीं संतान तेरा संहार करेगा !”

आकाशवाणी सुनकर कंस क्रोधित हो गया और देवकी और वसुदेव को मारने के लिए जैसे ही आगे बढ़ा। तब देवकी और वसुदेव ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए कहा कि कंस जो भी संतान जन्म लेगी, उसे वो पहले उसके सामने लाएंगे। कंस ने उनकी की बात मानते हुए देवकी और वसुदेव को मारने के बजाए कारागार में डाल दिया।

कारागार में ही देवकी ने एक-एक करके सात संतानों का जन्‍म दिया। लेकिन अत्याचारी कंस ने देवकी की सब संतानों को मार दिया। आठवीं बार फिर देवकी गर्भवती हुईं तभी कंस ने कारागार का पहरा और भी कड़ा कर दिया।

क्योंकि आकाशवाणी के अनुसार देवकी की आठवीं संतान कंस का काल थी। जब देवकी फिर से गर्भवती थीं। संयोगवश उस समय वसुदेव के प्रिय मित्र नंद की पत्नी यशोदा भी गर्भवती थीं।

समय पूरा होने पर भाद्रपद माह के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को कन्‍हैया का जन्‍म रोहिणी नक्षत्र में हुआ। संयोगवश उसी समय यशोदा ने एक पुत्री को जन्म दिया।

 

कन्‍हैया का जन्म होते ही कारागार में अचानक प्रकाश हुआ और भगवान श्री हरि विष्णु जी ने वसुदेव को दर्शन देकर कहा कि तुम इस बालक को अपने अपने मित्र नंद जी के यहां ले जाओ और वहां से उनकी कन्या को यहां लाओ।

यह बात सुनने के बाद वसुदेव जी ने वैसा ही किया। यशोदा जी के गर्भ से जन्‍मी कन्‍या कोई और नहीं बल्कि स्‍वयं माया थी।

जब वसुदेव जी ने कन्‍हैया को अपनी गोद में उठाकर, टोकरी में रखकर वृंदावन की ओर चले। तो कारागार के ताले खुद ही खुल गए, पहरेदार गहरी नीद में सो गए। कहते हैं कि जब वसुदेव जी कन्‍हैया को अपने मित्र नंद के घर ले जा रहे थे उस समय यमुना जी पूरे ऊफान पर थीं।

वसुदेव जी ने टोकरी को सिर पर रखा और यमुना ने भी शांत होकर वसुदेव को नंद जी के घर जाने का मार्ग दिखाया।

वसुदेव भगवान कृष्ण को लेकर नंद जी के यहां सकुशल पहुंच गए और वहां कन्‍हैया को यशोदा जी के पास रखकर कन्‍या को लेकर मथुरा वापस लौट आए।

 

कंस को जब देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली तो वह स्वयं कारागार पहुंचा और वहां उसने देखा कि आठवीं संतान तो कन्‍या है। कंस ने कन्या को देवकी से छीनकर जमीन पर पटकने ही लगा, कि वह मायारूपी कन्‍या उसके हाथ से निकल कर आसमान में पहुंचकर बोली कि:-

“हे मूर्ख कंस!” मुझे मारने से कुछ नहीं होगा क्योंकि तूझे मारने वाला जन्म ले चुका है और वह वृंदावन पहुंच गया है। अब जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड मिलेगा। इतना कहकर वो कन्या लुप्त हो गई।

यह बात सुनकर कंस बेहद क्रोधित हुआ और उसने वृंदावन में जन्‍में नवजातों का पता लगाया। जब यशोदा के लला का पता चला तो उसे मारने के लिए कई प्रयास किए। कई राक्षसों को भी भेजा लेकिन कोई भी उस बालक को मार नही पाया।

कंस को यह अहसास हो गया कि नंदबाबा का बालक ही वसुदेव-देवकी की आठवीं संतान है। कृष्‍ण ने युवावस्‍था में कंस का अंत किया। इस तरह जो भी यह कथा पढ़ता या सुनता है उसके समस्‍त पापों का नाश होता है।

 


 

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दोस्तों ! आपको यह Krishna katha कैसी लगी, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की कथा। जन्माष्टमी के दिन आप स्वयं भी सुनें और दूसरों को भी सुनाएं। इससे भगवान श्रीकृष्ण आपके कष्ट दूर करेगें और आपसे प्रसन्न होगे।

जय श्री राधेश्याम

 

By Meenakshi

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