आज भी बहुत से लोगों को maa vaishno devi ki katha नही पता है। इसलिए आज के इस article में हम आपके लिए लेकर आए है। एक devotional story जिसे पढ़ने से हमारे पाप कम होगें और mata vaishno devi पर हमारी आस्था बढ़ेगी। Stories on God पढ़ते ही एक अलग संतोष प्रतीत होता है मानो हमने अपने जीवन में सब कुछ पा लिया हो। आज की katha in hindi आपको जरूर अच्छी लगेगी। 

आपने जम्मू की वैष्णो माता का नाम अवश्य सुना होगा। आज हम आपको इन्हीं की कहानी सुना रहे हैं, जो बरसों से जम्मू-कश्मीर में सुनी व सुनाई जाती है। 

 

आज की हमारी धार्मिक कथा वैष्णी देवी की पौराणिक कथा है 

 

माता वैष्णो देवी ने त्रेता युग में माता पार्वती, सरस्वती और लक्ष्मी की शक्ति के रूप में मानव जाति के कल्याण के लिए एक सुंदर राजकुमारी के रूप में अवतार लिया था। जब समय आया, देवी का शरीर तीन दिव्य ऊर्जाओं के सूक्ष्म रूप में विलीन हो गया – महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती।

माता वैष्णो देवी का पवित्र स्थान त्रिकुटा पर्वत पर बना है। माना जाता है कि यह पर्वत देवी दुर्गा का दूसरा घर है। बुराई को समाप्त करने के लिए उसे तीन देवियों की शक्ति से बनाया गया था; इसलिए, पर्वत को त्रिकुटा कहा जाता है।

 

प्राचीन कथा के अनुसार कटरा के करीब हन्साली गाँव में माँ का परम भक्त श्रीधर पंडित रहता था। श्रीधर और उसकी पत्नी माँ दुर्गा की सुबह शाम पूजा करते थे।

श्रीधर निर्धन होते हुए भी अपनी पत्नी के साथ संतुष्टि से जीवन यापन कर रहा था बस उन्हें एक ही दुःख था कि उनके यहाँ कोई संतान ना थी।

वो दोनों दंपति नवरात्रि व्रत भी किया करते थे। एक दिन रात को श्रीधर के सपने में माँ जगदंबा आई और कहने लगी कि तुम नौ कुवांरी कन्याओं की पूजा कर के उन्हें भोजन करवाओ इससे तुम्हारी इच्छा जल्द ही पूरी होगी।

अष्टमी के दिन उन्होंने नवरात्रि पूजन के लिए कुँवारी कन्याओं को बुलवाया। माँ वैष्णो कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं। अन्य कन्याएँ तो चली गईं किंतु माँ वैष्णो नहीं गईं।

 

तब श्रीधर की पत्नी ने कन्या से पूछा कि-‘तुम्हे अपने घर जाने की जल्दी नहीं है क्या ? सारी कन्याए तो कब की चली गई।’

यह सुनकर कन्या हंसकर बोली- ‘ मैं आपके घर में भंडारा और ब्राहमण भोजन करवाना चाहती हूँ। आप ब्राहमणों को भंडारे का निमंत्रण दे आइए और साथ ही पूरे गांव के लोगों को भी बुला लाइए।’

श्रीधर ने उस दिव्य कन्या की बात मान ली और आस-पास के गाँवों में भंडारे का संदेश पहुँचा दिया। लौटते समय गोरखनाथ व भैरवनाथ जी को भी उनके चेलों सहित न्यौता दे दिया। सभी अतिथि हैरान थे कि आखिर कौन-सी कन्या है, जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है?

 

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भैरवनाथ एक प्रसिद्ध तांत्रिक था। भैरवनाथ गोरखनाथ के शिष्य थे, जिनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ थे। वह सभी तांत्रिक सिद्धियों पर नियंत्रण रखने के लिए माना जाता थे और भैरवनाथ को अपनी शक्ति का अभिमान था। 

भंडारे का दिन आ गया सभी लोग श्रीधर की कुटिया की और आने लगे। लोग को आता देख श्रीधर और उसकी पत्नी घबरा गए थे क्योंकि अभी तक लोगों को भोजन करवाने के लिए कुछ नही बना था दोनों दंपति माता की मूर्ति के सामने जा खड़े हुए और माँ की आराधना करने लगे। 

 

माँ की आराधना करते करते दोनों दंपति वहाँ पर सो गए। इतने में उनको एक दिव्य आवाज आई तुम घबराते क्यों हो देखो भंडारे करने के लिए सारा भोजन बन गया है।

चलो जल्दी से लोगों को भोजन परोसों जैसे ही श्रीधर और उसकी पत्नी ने पीछे मुड़कर देखा वो दिव्य कन्या खड़ी थी।

श्रीधर की कुटिया में बहुत-से लोग बैठ गए। दिव्य कन्या ने एक विचित्र पात्र से भोजन परोसना आरंभ किया।

 

जब कन्या भैरवनाथ के पास पहुँची तो वह बोले, ‘मुझे तो मांस व मदिरा चाहिए।’ ‘ब्राह्मण के भंडारे में यह सब नहीं मिलता।’ कन्या ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया। भैरवनाथ ने जिद पकड़ ली किंतु माता उसकी चाल भाँप गई थीं।

वह पवन का रूप धारण कर त्रिकूट पर्वत की ओर उड़ चलीं। भैरव ने उनका पीछा किया। माता के साथ उनका वीर लंगूर भी था। एक गुफा में माँ शक्ति ने नौ माह 9 माह तक तप किया।

भैरव भी उनकी खोज में वहां आ पहुंचा। एक साधु ने उससे कहा, “जिसे तू साधारण नारी समझता है वह तो महाशक्ति है।” भैरव ने साधु की बात अनसुनी कर दी।

 

माता गुफा की दूसरी और से मार्ग बनाकर बाहर निकल गई। वह गुफा आज भी गर्भ जून के नाम से जानी जाती है। देवी ने भैरव को लौटने की चेतावनी दी किंतु वह नहीं माना। मां गुफा के भीतर चली गई। 

माता की गुफा की रखवाली करने वाले हनुमानजी ने भैरव को युद्ध के लिए ललकारा और दोनों ने युद्ध किया। युद्ध का कोई अंत न देखकर, माता वैष्णवी ने महाकाली का रूप धारण करके भैरवनाथ का वध किया। भैरव का सिर भैरव घाटी में जा गिरा। 

 

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ऐसा कहा जाता है कि अपने वध के बाद, भैरवनाथ ने अपनी गलती पर पश्चाताप किया और माँ से क्षमा मांगी। माता वैष्णो देवी जानती थीं कि उन पर हमला करने के पीछे भैरव का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना था। 

तब उन्होंने न केवल पुनर्जन्म के चक्र से भैरव को मुक्ति प्रदान की, बल्कि मां ने उसे वरदान दिया कि जो भी मेरे दर्शनों के पश्चात भैरव के दर्शन करेगा, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी।

आज भी प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु माता वैष्णो के दर्शन करने आते हैं गुफा में माता पिंडी रूप में विराजमान है।

 

 


 

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Image credit:- canva

Written by:- Meenakshi